खिसके हुए लग रहे हो कांच के गुरु
5:00 बजे: कई बार आंख जल्दी खुल जाती है तो बाहर का नजारा देखकर हैरानी हो सकती है। कोहरा इतना घना कि उसे देखकर मन ही मन सर्दी दोगुनी-तिगुनी ह...
Read more »5:00 बजे: कई बार आंख जल्दी खुल जाती है तो बाहर का नजारा देखकर हैरानी हो सकती है। कोहरा इतना घना कि उसे देखकर मन ही मन सर्दी दोगुनी-तिगुनी ह...
Read more »7:00 बजे: बहुत दिनों से दिन की शुरुआत का समय कोई निश्चित नहीं है। दौड़ते हुए इधर भागो, फिर उधर भागो। ऐसा लगता है जैसे लाइफ न हो गयी कोई एक्...
Read more »6:00 बजे: बूंदों के शोर से मेरी आंख खुलनी तय थी। यह भी मुमकिन था कि दिन भर का यह खेल होगा। कूदकर चप्पलों को तलाश किया। सुबह की ताजगी के लिए...
Read more »7:00 बजे : सुबह सुस्त नहीं हो सकती थी, मगर वह हो ही गयी। मौसम देखा तो धूप बिल्कुल नहीं खिली थी। वैसे भी दस बजे ध्वजारोहण का कार्यक्रम था। द...
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